दैनिक केसरिया हिंदुस्तान फैसल कुरैशी
अब संविधान, विधि के शासन और मानवीय गरिमा की परीक्षा बन चुका है
मथुरा, उत्तर प्रदेश।
मथुरा के मौजा केशोपुर–मनोहरपुर स्थित कब्रिस्तान अहले मुसलेमीन से जुड़ा विवाद अब केवल एक स्थानीय प्रशासनिक विवाद नहीं रह गया है। उपलब्ध अभिलेखों और शिकायतों के आधार पर यह मामला धार्मिक स्थल की सुरक्षा, विधिसम्मत प्रशासनिक कार्रवाई, मृतकों की गरिमा तथा संविधान द्वारा संरक्षित अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है।
कब्रिस्तान प्रबंधन समिति के अनुसार अप्रैल 2026 में नगर निगम से संबद्ध एक जेसीबी के कब्रिस्तान परिसर में प्रवेश के दौरान कई कब्रों, सीमांकन संरचनाओं, वृक्षों और अन्य संपत्तियों को क्षति पहुँची। इसके बाद विभिन्न विभागों के समक्ष शिकायतें, IGRS प्रार्थना-पत्र तथा सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत किए गए। हाल के दिनों में इस विषय को राष्ट्रीय मीडिया ने भी प्रमुखता से प्रकाशित किया है।
समिति का कहना है कि प्रशासनिक अभिलेखों में कथित रूप से प्रति क्षतिग्रस्त कब्र ₹100 का आकलन किया गया। समिति का मत है कि यह केवल मुआवज़े की राशि का प्रश्न नहीं, बल्कि मृतकों के सम्मान और धार्मिक आस्था से जुड़े व्यापक मुद्दे का विषय है।
चार दशकों से कब्रिस्तान की देखरेख
कब्रिस्तान प्रबंधन समिति के अध्यक्ष जनाब जमालुद्दीन खान पिछले लगभग चार दशकों से कब्रिस्तान की देखरेख और प्रबंधन से जुड़े हुए हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार उन्होंने अनेक पीढ़ियों को इसी कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक होते देखा है और वे कब्रिस्तान की सीमाओं, इतिहास तथा परंपराओं के प्रत्यक्ष साक्षी रहे हैं।
उनका कहना है कि यह कब्रिस्तान कोई नई भूमि नहीं, बल्कि लंबे समय से समुदाय द्वारा उपयोग में रहा दफन स्थल है, जिसका उल्लेख पुराने अभिलेखों और वक्फ रिकॉर्ड में होने का दावा किया जाता है।
30 वर्षों से सेवा कर रहे गोरकन की गवाही
करीब 63–65 वर्षीय शरीफ उर्फ सलीम, जो पिछले लगभग 25–30 वर्षों से इस कब्रिस्तान में कब्र खोदने (गोरकन) का कार्य कर रहे हैं, बताते हैं—
«”मेरी पूरी ज़िंदगी इसी कब्रिस्तान की सेवा में बीत गई। मैंने अपने हाथों से हजारों कब्रें खोदी हैं। आज भी करीब 25 वर्ष पुराने मुख्य द्वार की चाबी वर्षों से मेरे पास रहती है। मैंने कई पीढ़ियों को यहाँ सुपुर्द-ए-खाक होते देखा है। यह कोई साधारण ज़मीन नहीं, बल्कि हमारे बुज़ुर्गों की अमानत और इतिहास का हिस्सा है। जब कब्रों को क्षति पहुँची तो लोगों को गहरा मानसिक आघात पहुँचा।”»
मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह विवाद केवल भूमि या मुआवज़े का प्रश्न नहीं है। यदि किसी धार्मिक दफन स्थल को क्षति पहुँची है, तो इससे कई व्यापक संवैधानिक और कानूनी प्रश्न उत्पन्न हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं—
– विधि के समक्ष समानता और निष्पक्ष प्रशासन।
– धार्मिक स्थलों के प्रति विधिसम्मत व्यवहार।
– मृतकों और उनके परिजनों की गरिमा का सम्मान।
– प्रशासनिक निर्णयों की पारदर्शिता और जवाबदेही।
इन प्रश्नों का अंतिम निर्णय सक्षम न्यायालय उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर करेगा।
उपलब्ध अभिलेख
समिति के अनुसार उनके पास निम्न प्रकार के दस्तावेज़ उपलब्ध हैं—
– वक्फ से संबंधित अभिलेख और अधिसूचना संबंधी रिकॉर्ड।
– राजस्व अभिलेख।
– IGRS शिकायतों का रिकॉर्ड।
– RTI के माध्यम से प्राप्त उत्तर।
– स्थल की तस्वीरें और वीडियो।
– स्थानीय निवासियों एवं संबंधित व्यक्तियों के कथन।
समिति की मांग
कब्रिस्तान प्रबंधन समिति ने मांग की है कि—
1. पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए।
2. सभी उपलब्ध अभिलेखों और दस्तावेज़ों का परीक्षण किया जाए।
3. यदि जांच में किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति की जिम्मेदारी स्थापित होती है, तो उसके विरुद्ध विधि के अनुसार कार्रवाई की जाए।
4. भविष्य में धार्मिक एवं ऐतिहासिक दफन स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएँ।
मीडिया से अपील
समिति ने देश के सभी मीडिया संस्थानों से अनुरोध किया है कि इस विषय की तथ्यात्मक, निष्पक्ष और संतुलित रिपोर्टिंग करें। साथ ही संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों का पक्ष भी अवश्य प्रकाशित करें, ताकि पाठकों के सामने समग्र तथ्य प्रस्तुत हो सकें।
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अस्वीकरण: यह प्रेस नोट कब्रिस्तान प्रबंधन समिति द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेज़ों, शिकायतों और संबंधित व्यक्तियों के कथनों पर आधारित है। जहाँ किसी घटना या जिम्मेदारी पर विवाद है, वहाँ संबंधित पक्षों के कथन और उपलब्ध अभिलेखों का उल्लेख किया गया है। किसी भी दावे का अंतिम निर्धारण सक्षम न्यायालय या विधिक प्राधिकरण द्वारा ही किया जाएगा।
Author: Dainik kesariya Hindustan
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