सत्ता की सीढ़ी या सिर्फ इस्तेमाल चुनाव जीतते ही क्यों भुला दिया जाता है कार्यकर्ता झंडा उठाने से लेकर सरकार बनाने तक कार्यकर्ता आगे लेकिन सत्ता मिलते ही दरवाजे पर क्यों रह जाता है उसका अधिकार

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दैनिक केसरिया हिंदुस्तान जिला संवाददाता सिवनी

दैनिक केसरिया हिंदुस्तान सिवनी कार्यकर्ता आखिर है क्या यह सवाल आज राजनीतिक गलियारों में पहले से ज्यादा गूंज रहा है क्या कार्यकर्ता केवल चुनाव के समय झंडा उठाने दरी बिछाने भीड़ जुटाने और नारे लगाने का माध्यम भर है या फिर वह किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत है हर चुनाव में कार्यकर्ता को बड़े-बड़े सपने दिखाए जाते हैं कहा जाता है कि संगठन मजबूत होगा तो राष्ट्र मजबूत होगा सरकार बनेगी तो संस्कृति और सभ्यता सुरक्षित रहेगी देश विश्वगुरु बनेगा इन आदर्शों और विश्वास के साथ हजारों कार्यकर्ता अपना समय मेहनत पैसा परिवार और कई बार अपना भविष्य तक दांव पर लगा देते हैं लेकिन सवाल तब उठता है जब चुनाव खत्म होते हैं और सत्ता मिल जाती है इसके बाद वही कार्यकर्ता जिसने दिन-रात एक कर पार्टी को जीत दिलाई धीरे-धीरे हाशिए पर धकेल दिया जाता है अगले चुनाव तक उसे मानो रिजर्व में डाल दिया जाता है। उसकी जगह नेताओं के आसपास दलाल बिचौलिए और प्रभावशाली लोग दिखाई देने लगते हैं जिनका चुनावी संघर्ष से शायद ही कोई लेना-देना रहा हो जिस कार्यकर्ता ने धूप में पसीना बहाया गांव-गांव संगठन खड़ा किया और जनता के बीच पार्टी का संदेश पहुंचाया वही आज अपने छोटे-से काम के लिए कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर दिखाई देता है। कई कार्यकर्ताओं का आरोप है कि बिना सिफारिश बिना पहचान और बिना आर्थिक प्रभाव के सरकारी कार्यालयों में सामान्य कार्य भी आसानी से नहीं हो पाते यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है क्या राजनीतिक कार्यकर्ता केवल चुनावी मौसम का उपकरण बनकर रह गया है क्या उसका सम्मान और महत्व केवल वोट पड़ने तक सीमित है दूसरी ओर जनता के बीच यह चर्चा भी लगातार सुनाई देती है कि कई सरकारी अधिकारी चुनाव नहीं लड़ते राजनीतिक जोखिम नहीं उठाते और न ही जनता के बीच जाकर संघर्ष करते हैं फिर भी कुछ वर्षों में उनकी आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव दिखाई देता है ऐसे मामलों को लेकर समय-समय पर पारदर्शिता जवाबदेही और जांच की मांग भी उठती रही है राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि किसी भी दल को अपने संगठन को वास्तव में मजबूत बनाना है तो सबसे पहले उसे अपने समर्पित कार्यकर्ताओं के सम्मान भागीदारी और विश्वास को बनाए रखना होगा क्योंकि सत्ता का आधार अंततः वही कार्यकर्ता होता है, जो बिना किसी पद या स्वार्थ के संगठन के लिए संघर्ष करता है अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या कार्यकर्ता सिर्फ चुनाव जीतने का साधन है, या सत्ता में उसकी भी बराबर की हिस्सेदारी और सम्मान होना चाहिए भारतीय जनता पार्टी में वर्षों से सक्रिय रहने वाले सिवनी जिले के कलार राय समाज के कार्यकर्ताओं के बीच प्रतिनिधित्व को लेकर असंतोष की चर्चा तेज हो गई है समाज के लोगों का कहना है कि वर्ष 1988-89 के आसपास भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सक्रिय भूमिका निभाने वाले सिवनी के रामलाल राय के बाद आज तक सिवनी जिले से कलार समाज का कोई भी व्यक्ति प्रदेश कार्यकारिणी में स्थान नहीं पा सका समाज के वरिष्ठ लोगों का दावा है कि रामलाल राय ने संगठन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और संगठन मंत्री के रूप में भी दायित्व निभाया था इसके बावजूद पिछले तीन दशकों से अधिक समय में प्रदेश स्तर पर समाज को प्रतिनिधित्व नहीं मिलने से कार्यकर्ताओं में निराशा बढ़ रही है चर्चा यह भी है कि पार्टी के लिए लगातार मेहनत करने वाले कई कार्यकर्ता वर्षों से संगठन के विस्तार में जुटे हैं लेकिन प्रदेश स्तर पर उन्हें अपेक्षित अवसर नहीं मिल पाए ऐसे में कार्यकर्ता अब संगठन से समान भागीदारी और सम्मानजनक प्रतिनिधित्व की उम्मीद जता रहे हैं समाज के लोगों का कहना है कि यदि अन्य जिलों और समाजों को संगठन में प्रतिनिधित्व मिल सकता है तो सिवनी के समर्पित कार्यकर्ताओं को भी उनकी निष्ठा और योगदान के आधार पर अवसर मिलना चाहिए

Dainik kesariya Hindustan
Author: Dainik kesariya Hindustan

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