जनता पर हावी होती नौकरशाही, बढ़ता आक्रोश, सुधार की मांग तेज

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दिनेश शुक्ला
दैनिक केसरिया हिंदुस्तान

एडवोकेट अनिमेष आँचलिया, जगदेवगंज आलोट, जिला रतलाम की कलम से
आलोट:- भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जहां नौकरशाही का मूल उद्देश्य जनता की सेवा करना है, वहीं वर्तमान परिस्थितियों में आमजन के बीच इसके विपरीत तस्वीर उभरकर सामने आ रही है। सरकारी दफ्तरों में छोटे-छोटे कार्यों के लिए लोगों को बार-बार चक्कर लगाने पड़ रहे हैं और बिना भ्रष्टाचार के काम होना मुश्किल होता जा रहा है। इससे नागरिकों में असंतोष और आक्रोश लगातार बढ़ रहा है।
जानकारों का मानना है कि शासन-प्रशासन में जवाबदेही की कमी और कार्यप्रणाली की जटिलता ने आम जनता को परेशान कर दिया है। कई मामलों में देखा गया है कि शिकायत करने या विरोध दर्ज कराने वाले नागरिकों पर ही “सरकारी कार्य में बाधा” या “अशांति फैलाने” जैसे आरोप लगाकर कार्रवाई कर दी जाती है। यहां तक कि ऑनलाइन शिकायतों पर भी मानहानि जैसे प्रकरण दर्ज होने की घटनाएं सामने आई हैं।
हाल ही में एक चर्चित मामले में नामांतरण की फाइल के लिए एक युवक को लगभग एक वर्ष तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़े। बार-बार फाइल गुम होने की बात कहे जाने से क्षुब्ध होकर युवक ने अधिकारी का ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रतीकात्मक रूप से टेबल पर बादाम बिखेर दिए, जिसके बाद संबंधित अधिकारी ने युवक के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी। इस घटना ने प्रशासनिक संवेदनशीलता और कार्यशैली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सूचना के अधिकार (RTI) कार्यकर्ताओं और व्हिसलब्लोअर्स के उत्पीड़न के कई उदाहरण भी सामने आते रहे हैं। वहीं, कुछ विभागों में आंतरिक स्तर पर भी तनाव की स्थिति बनी रहती है, जहां वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा कनिष्ठ कर्मचारियों पर दबाव और प्रताड़ना के आरोप लगते रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, सरकारी विभागों की स्थापना मूलतः जनता को सुगम और सुलभ सेवाएं प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी, लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था अपने मूल लक्ष्य से भटकती नजर आ रही है। लोगों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी सुधार नहीं किए गए, तो इसके दूरगामी और गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
विभिन्न सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों ने प्रशासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और संवेदनशीलता बढ़ाने की मांग की है। उनका कहना है कि आवश्यकता पड़ने पर कानूनों में संशोधन कर व्यवस्था को अधिक जनहितैषी बनाया जाना चाहिए, ताकि लोकतंत्र की मूल भावना—“जनता की सेवा”—वास्तविक रूप में स्थापित हो सके।

Dainik kesariya Hindustan
Author: Dainik kesariya Hindustan

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