रिपोर्ट मथुरा. नारायण सिंह गुर्जर
बच्चे स्कूल के बाहर जमीन पर बैठे हैं या बैग लेकर खेल रहे हैं। टीचर गायब हैं।
“तस्वीरें बाबूगढ़ के प्राथमिक विद्यालय की हैं। जहाँ भविष्य (बच्चे) तो वक्त पर पहुँच गया है, लेकिन उस भविष्य को संवारने वाले ‘गुरुजी’ अभी भी घर पर चाय की चुस्कियाँ ले रहे हैं।”
बड़े अक्षरों में लिखा आए— सरकारी समय: सुबह 7:30 से दोपहर 12:00 बजे तक।
“सरकार का सख्त आदेश है—स्कूल सुबह 7:30 बजे खुलेगा। लेकिन यहाँ नियम कागजों पर दम तोड़ रहे हैं। घड़ी में 9 बज रहे हैं, पर स्कूल के कमरों के ताले नहीं खुले।”
“बेटा, कितनी देर से आए हो?”
बच्चा: “साढ़े सात बजे से आए हैं, मास्टर साहब अभी नहीं आए।”
इन मासूमों का क्या कसूर? ये पढ़ने की ललक लेकर तपती धूप में इंतजार कर रहे हैं, और जिम्मेदार लोग अपनी जिम्मेदारी से बेखबर हैं।”
”जब साहब आए, तो चेहरे पर न पछतावा था, न डर। सवाल पूछने पर जवाब मिलता है—’रास्ता खराब था’ या ‘तबीयत ठीक नहीं थी’।”
सवाल प्रशासन से है—क्या बाबूगढ़ का ये स्कूल नियमों से ऊपर है? अगर प्राइवेट स्कूलों की तर्ज पर सरकारी स्कूलों को लाना है, तो सबसे पहले समय की पाबंदी जरूरी है। अधिकारियों को चाहिए कि वे एयर-कंडीशन्ड दफ्तरों से निकलकर इन स्कूलों का औचक निरीक्षण करें।”
देखते रहिए, कब जागता है प्रशासन और कब सुधरता है बाबूगढ विद्यालय
एबीएसए छाता दिनेश त्रिपाठी ने कहा कि 7:30 बजे से लेकर 12:30 बजे तक का बच्चन ं का टाइमिंग है और स्कूल से 1:30 पर टीचरों की टाइमिंग है जैसे मुझे मालूम हुआ है कि बाबूगढ़ गांव में स्थित प्राथमिक विद्यालय पर टीचर लेट पहुंचे रहे हैं उसको लेकर मेरे द्वारा मौके पर जाकर कल निरीक्षण करके जांच की जाएगी
”स्कूल चलो अभियान” के नारों
Author: Dainik kesariya Hindustan
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