तीर से बचा, लापरवाही से हारा ‘बायसन’: वन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे गंभीर सवाल! कार्यवाही की मांग तेज

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(केसरिया हिंदुस्तान जिला ब्यूरो चीफ तोरन कुमार कबीरधाम)

कवर्धा : पंडरिया वन्यजीव संरक्षण की बड़ी सफलता बताकर जिस वयस्क गौर (बायसन) को वन विभाग ने शिकारियों के तीरों से बचाने का दावा किया था, वही बेजुबान अब संदिग्ध परिस्थितियों में दम तोड़ चुका है। 25 अप्रैल की रात लगभग 9:30 बजे उसकी मौत की खबर ने पूरे मामले को राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर बना दिया है। जब बायसन के शरीर में तीन-तीन तीर धंसे मिले थे और जटिल शल्य-क्रिया हुई थी, तब उसे पूर्ण स्वस्थ घोषित कर भीषण गर्मी में जंगल में छोड़ने का फैसला किस आधार पर लिया गया, यह गंभीर जांच का विषय है।

वन परिक्षेत्र पंडरिया (पूर्व) में पहले तीर से घायल गौर का ऑपरेशन कर उसे “सुरक्षित” बताया गया। विभागीय विज्ञप्तियों में लगातार स्वास्थ्य में सुधार का दावा किया जाता रहा। लेकिन अचानक हुई मौत ने इन दावों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। यदि उपचार प्रभावी और वैज्ञानिक था, तो एक महीने के भीतर उसकी मृत्यु होना गंभीर प्रशासनिक चूक को दर्शाता है।

कानून का स्पष्ट प्रावधान
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत गौर अनुसूची-1 में संरक्षित प्रजाति है। इसका अर्थ है कि इस वन्यजीव को सर्वोच्च कानूनी संरक्षण प्राप्त है। अधिनियम की धारा 9 शिकार को पूर्णतः प्रतिबंधित करती है, जबकि धारा 39 के तहत वन्यजीव राज्य की संपत्ति माने जाते हैं। संरक्षित वन्यजीव की मृत्यु केवल शिकार तक सीमित अपराध नहीं है, बल्कि यदि उपचार में लापरवाही सिद्ध होती है तो यह गंभीर प्रशासनिक एवं कानूनी उत्तरदायित्व का विषय बनता है।

ऑपरेशन के बाद निगरानी की अनदेखी
जानकारी के अनुसार, बायसन के पैर की मांसपेशियों में गहराई तक तीर धंसे हुए थे। सर्जरी के बाद सामान्य प्रोटोकॉल के तहत ऐसे वन्यजीव को नियंत्रित, सुरक्षित एवं चिकित्सकीय निगरानी वाले वातावरण में रखा जाना चाहिए था। बड़े वन्यजीवों में पोस्ट-ऑपरेटिव संक्रमण, आंतरिक रक्तस्राव और मांसपेशीय जटिलताओं का जोखिम बना रहता है।

भीषण गर्मी के दौरान उसे खुले जंगल में छोड़ देना संरक्षण मानकों के विपरीत प्रतीत होता है। यदि पर्याप्त रिकवरी अवधि और चिकित्सकीय निगरानी सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह निर्णय गंभीर लापरवाही की श्रेणी में आ सकता है।
विज्ञप्तियों का सच और जमीन की हकीकत

वन विभाग लगातार प्रेस विज्ञप्ति जारी कर गौर के स्वास्थ्य में सुधार का दावा करता रहा। मगर 25 अप्रैल की रात हुई मौत ने विभागीय दावों की सच्चाई पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि वास्तविक स्थिति अलग थी, तो जनता को भ्रमित करना भी जवाबदेही के दायरे में आता है।

वन्यजीव संरक्षण केवल रेस्क्यू ऑपरेशन तक सीमित नहीं होता, बल्कि पूर्ण पुनर्वास और वैज्ञानिक निगरानी तक इसकी जिम्मेदारी रहती है।

जिम्मेदारी तय होनी चाहिए
शिकारियों के खिलाफ कार्रवाई आवश्यक थी और उन्हें जेल भेजा गया। लेकिन अब जबकि संरक्षित वन्यजीव की मृत्यु हो चुकी है, तो पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच अनिवार्य हो जाती है। यदि लापरवाही, गलत चिकित्सकीय निर्णय या प्रबंधन की कमी सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध भी नियमानुसार प्रकरण दर्ज कर कार्रवाई की जानी चाहिए।
उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच समिति गठित कर पोस्टमार्टम रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि तथ्य स्पष्ट हों और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

राष्ट्रीय महत्व का संरक्षण प्रश्न
गौर भारत का सबसे बड़ा जंगली गोवंश है और पारिस्थितिकी संतुलन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। छत्तीसगढ़ जैसे जैव विविधता संपन्न राज्य में इस प्रकार की घटना संरक्षण तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता उत्पन्न करती है।
यह केवल एक वन्यजीव की मृत्यु नहीं, बल्कि संरक्षण प्रणाली की परीक्षा है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की कठोरता तभी सार्थक होगी जब विभागीय जवाबदेही भी समान रूप से सुनिश्चित की जाएगी।

Dainik kesariya Hindustan
Author: Dainik kesariya Hindustan

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