पुरुषार्थ, संयम, स्वाध्याय और धर्मकार्य से आत्मोन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है — मुनि श्री उद्यम सागर महाराज

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केसरिया हिंदुस्तान सचिन दीक्षित विदिशा

विदिशा। “जीवन में प्राप्त होने वाले सुख, शांति और समृद्धि संयोगवश नहीं मिलते, बल्कि पूर्व में किए गए शुभ पुरुषार्थ, सत्कर्म और पुण्य के परिणामस्वरूप प्राप्त होते हैं।” उक्त उद्गार मुनि श्री उद्यम सागर महाराज ने श्री शांतिनाथ जिनालय स्टेशन जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्या वाणी’ ने बताया 25 जून गुरुवार को मुनिसंघ के मंगल प्रवचन श्री पारसनाथ दि. जैन मंदिर अरिहंत विहार में प्रातः 8:30 बजे से होंगे!
के दौरान मुनिश्री ने कहा कि जिनके जीवन में आज सुख, शांति और वैभव दिखाई देता है, उसके पीछे उनके पूर्व के श्रेष्ठ कर्मों का योगदान है। वहीं जिनके जीवन में इनका अभाव है, उन्हें आत्ममंथन कर अपने पुरुषार्थ को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए।उन्होंने कहा कि उच्च कुल में जन्म, देव-शास्त्र-गुरु का सान्निध्य तथा धर्म का अवसर मिलना भी पूर्व जन्मों में अर्जित पुण्य का प्रतिफल है। किंतु केवल इतना प्राप्त हो जाना ही पर्याप्त नहीं है। आत्मा की उन्नति का मार्ग अनंत है तथा ज्ञान, बुद्धि और शांति की कोई सीमा नहीं है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को निरंतर आत्मविकास और आत्मकल्याण के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।
संयम और आयु कर्म के संबंध पर प्रकाश डालते हुए मुनिश्री ने कहा कि जीव के वर्तमान संस्कार, त्याग की भावना तथा धर्म में रुचि उसके पूर्व में बंधे कर्मों से प्रभावित होती है। जिन जीवों में त्याग, तप, दान और संयम के संस्कार प्रबल होते हैं, वे भोग-विलास के वातावरण में रहकर भी धर्म की ओर उन्मुख रहते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वास्तविक पुण्य धन-संपत्ति के संग्रह में नहीं, बल्कि दान, धर्म, सेवा और सदाचार में प्रकट होता है।

Dainik kesariya Hindustan
Author: Dainik kesariya Hindustan

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