अभिवादन केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि हमारे संस्कारों और संस्कृति का प्रथम परिचय होता है

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दैनिक केसरिया हिंदुस्तान पंकज जैन

अम्बाह। मुरैना । मनुष्य जब किसी से मिलता है, तो उसके व्यक्तित्व की पहली झलक उसके अभिवादन से मिलती है। जिस प्रकार वृक्ष अपनी जड़ों से शक्ति प्राप्त करता है, उसी प्रकार मनुष्य अपनी संस्कृति और संस्कारों से अपनी पहचान बनाता है। जैन धर्म के अनुयायी आपस में मिलने पर ‘जय जिनेन्द्र’ का प्रयोग अभिवादन के रूप में करते हैं। यह दो शब्दों -‘जय’ और ‘जिनेन्द्र’ से मिलकर बना है। इसका सीधा सा अर्थ है – उन परमात्मा को नमस्कार जो अपनी सभी इंद्रियों और दोषों के विजेता हैं। जिन’ का अर्थ होता है जीतने वाला, जिन्होंने अपने मन, अपनी पाँचों इंद्रियों, और आंतरिक शत्रुओं (जैसे- मोह, राग, द्वेष, क्रोध, लोभ) पर विजय प्राप्त कर ली है, उन्हें ‘जिन’ या ‘जिनेन्द्र’ कहा जाता है। अन्य अभिवादनों के विपरीत, इसमें किसी विशेष व्यक्ति या शक्ति का नाम न होकर, एक आदर्श और त्यागमय जीवन की स्तुति होती है। इस शब्द के माध्यम से व्यक्ति यह याद दिलाता है कि हमें भी ‘जिन’ (भगवान) के बताए मार्ग पर चलना चाहिए और अपने विकारों पर विजय पानी चाहिए। आज अधिकांश लोग मिलते ही सहज रूप से ” *Good Morning* ” कह देते हैं। यह कहना गलत नहीं है, लेकिन यह विचार अवश्य करना चाहिए कि क्या हम अपनी हजारों वर्षों पुरानी *भारतीय अभिवादन परंपरा* को भूलते जा रहे हैं? अंग्रेज़ी एक वैश्विक भाषा हो सकती है, परंतु हमारी संस्कृति और पहचान का आधार नहीं। हमारी पहचान हमारी मातृभाषा, हमारे संस्कार और हमारी सभ्यता से है। जय जिनेंद्र’ जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा किया जाने वाला एक अत्यंत पवित्र और लोकप्रिय अभिवादन है। इसका अर्थ है: “जिनेन्द्र भगवान/तीर्थंकरों की जय हो” । जय का अर्थ है विजय, गुणगान या महिमा। जिनेंद्रः यह दो शब्दों ‘जिन’ और ‘इंद्र’ से बना है। ‘जिन’ का अर्थ है वह व्यक्ति जिसने अपने मन, शरीर, और सभी आंतरिक विकारो पर विजय प्राप्त कर ली हो। ‘इंद्र’ का अर्थ स्वामी या प्रमुख होता है। जब कोई व्यक्ति ‘जय जिनेंद्र’ कहता है, तो इसका मतलब है कि वह सामने वाले व्यक्ति के भीतर मौजूद उस शुद्ध, दिव्य आत्मा और उनके आदर्श (भगवान) का सम्मान कर रहा है। इसके माध्यम से आत्मिक विजय और भगवान द्वारा बताए गए सत्य के मार्ग की सराहना की जाती है। यह केवल एक नमस्कार या अभिवादन नहीं, बल्कि एक-दूसरे को अपने आंतरिक शत्रुओं (क्रोध, लोभ, मोह आदि) पर विजय पाने की प्रेरणा देने का माध्यम भी है।आज कुछ लोग यह मानते हैं कि “*Good Morning”* कहना ही आधुनिकता और शिक्षित होने की पहचान है। परंतु वास्तविक शिक्षा केवल भाषा बदलने में नहीं, बल्कि अपने संस्कारों और संस्कृति का सम्मान करने में है। शिक्षित वही है, जिसके व्यवहार में विनम्रता और अपने मूल्यों के प्रति श्रद्धा दिखाई दे। भारतीय संस्कृति में अभिवादन केवल शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह सम्मान और विनम्रता की अभिव्यक्ति है। हमारे यहाँ प्रातःकाल उठकर माता-पिता, गुरुजनों और परिवार के वरिष्ठजनों के चरण स्पर्श करने की परंपरा रही है। शास्त्रों में कहा गया है
” *अभिवादनशीलस्य नित्यं* *वृद्धोपसेविनः।*
*चत्वारि तस्य वर्धन्ते—* *आयुर्विद्या* *यशो बलम्॥”*
*अर्थात्*- जो व्यक्ति नित्य बड़ों का सम्मान और अभिवादन करता है, उसकी आयु, विद्या, यश और बल में वृद्धि होती है। भारत की संस्कृति सदैव आध्यात्मिकता की संस्कृति रही है। ” *नमस्ते* ” का अर्थ है— मैं आपके भीतर स्थित दिव्यता को प्रणाम करता हूँ। ” *जय जिनेन्द्र”* आत्मा की विजय का संदेश देता है। ” *राम-राम”,* ” *सीताराम* “, ” *हरे* *कृष्ण* ” जैसे अभिवादन ईश्वर-स्मरण के साथ दिन की शुभ शुरुआत कराते हैं। हमारे ऋषि-मुनियों ने कहा है कि प्रातःकाल जिन शब्दों का उच्चारण किया जाता है, उनका प्रभाव पूरे दिन के मन और विचारों पर पड़ता है। इसलिए सुबह की शुरुआत ईश्वर के नाम और मंगलमय अभिवादन से करना भारतीय संस्कृति की सुंदर परंपरा रही है।
एक युवा ही राष्ट्र की पहचान होता है। यदि वह अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को भूल जाएगा, तो आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी जड़ों से दूर हो जाएँगी। आधुनिकता को अपनाइए, अंग्रेज़ी सीखिए, लेकिन अपनी संस्कृति का त्याग मत कीजिए।
सुबह ” *Good Morning* ” कहना गलत नहीं है, लेकिन यदि हम अपनी भारतीय संस्कृति और परंपरा को जीवित रखना चाहते हैं, तो ” *नमस्ते* “, ” *जय जिनेन्द्र* “, ” *राम-राम”,* ” *सीताराम* ” या *”हरे* *कृष्ण* ” जैसे भारतीय अभिवादन अपनाना एक सुंदर और प्रेरणादायी पहल हो सकती है।

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Author: Dainik kesariya Hindustan

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