दैनिक केसरिया हिंदुस्तान से राधेश्याम गुप्ता
लोकतंत्र के मंदिर में यदि कोई सबसे अधिक उपेक्षित है, तो वह न सत्ता है, न विपक्ष, न अफसरशाही और न ही पूंजीपति—सबसे अधिक उपेक्षित है वह पत्रकार, जिसकी कलम पर लोकतंत्र की सांसें टिकी हैं। यह कैसी विडंबना है कि देश का नीतिनिर्धारक हर वर्ग के श्रम का मूल्य तय कर देता है, लेकिन जिस पत्रकार के शब्द सरकारें हिलाने का सामर्थ्य रखते हैं, उसके परिश्रम का कोई मूल्यांकन नहीं करता। आखिर यह कैसी नीति है? यह कैसा लोकतंत्र है? क्या पत्रकार का पसीना पसीना नहीं, या उसकी मेहनत केवल सत्ता के उपयोग की वस्तु बनकर रह गई है?
देश का मजदूर दिनभर मेहनत करता है, शाम को मजदूरी लेकर घर लौटता है। कर्मचारी महीने भर काम करता है, वेतन उसके खाते में पहुंच जाता है। जनप्रतिनिधि जनता की सेवा का दावा करते हुए वेतन, भत्ते और आजीवन सुविधाएं लेते हैं। नौकरशाहों के लिए वेतन आयोग बैठते हैं, महंगाई भत्ता बढ़ता है और पेंशन की व्यवस्था होती है। लेकिन पत्रकार? उसके हिस्से में आता है केवल संघर्ष, असुरक्षा, अपमान और जोखिम। क्या लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का यही सम्मान है?
सुबह अंधेरा छंटने से पहले अखबार वितरक घर-घर दस्तक देता है। दूसरी ओर संवाददाता प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर मुख्यमंत्री, जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, तहसील, ब्लॉक, अस्पताल, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, गांवों और शहरों की गलियों तक भटकता है। वह जनता की पीड़ा सुनता है, भ्रष्टाचार की परतें खोलता है, अपराध का पीछा करता है, सत्ता से सवाल पूछता है और अंततः अपनी कलम से सच को इतिहास का दस्तावेज बना देता है। लेकिन उसके इस तप, त्याग और परिश्रम की कोई सरकारी कीमत नहीं है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर क्यों?
क्या इसलिए कि पत्रकार वोट बैंक नहीं है? क्या इसलिए कि पत्रकार सड़क जाम कर सरकारों को झुकाने की राजनीति नहीं करता? क्या इसलिए कि पत्रकार अपने अधिकारों के लिए संसद घेरने के बजाय जनता की लड़ाई लड़ता है? यदि यही कारण है तो यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि राजनीतिक स्वार्थ का नंगा सच है।
कड़वा सत्य यह है कि सत्ता को पत्रकार तब तक प्रिय लगता है, जब तक वह उसकी उपलब्धियां छापता है। जैसे ही वही पत्रकार भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी, घोटाले, प्रशासनिक लापरवाही या राजनीतिक पाखंड का पर्दाफाश करता है, वह सत्ता की आंखों की किरकिरी बन जाता है। उसके पीछे फर्जी मुकदमे लगा दिए जाते हैं। विज्ञापन रोक दिए जाते हैं। दबंग और माफिया उसके घर तक पहुंच जाते हैं। उसे धमकियां मिलती हैं। कभी उसकी हत्या कर दी जाती है, तो कभी उसकी आवाज को आर्थिक रूप से कुचल दिया जाता है।
यह किसी एक प्रदेश की कहानी नहीं, बल्कि पूरे देश का कटु यथार्थ है।
विडंबना देखिए, नेता की सुरक्षा के लिए सुरक्षाकर्मी हैं, अधिकारी की सुरक्षा के लिए कानून है, उद्योगपति की सुरक्षा के लिए व्यवस्था है, लेकिन पत्रकार की सुरक्षा उसके साहस और ईश्वर के भरोसे छोड़ दी गई है। यह कैसी शासन व्यवस्था है, जिसमें सच लिखना सबसे बड़ा अपराध बना दिया गया है?
आज पत्रकारिता केवल खबर लिखने का माध्यम नहीं रही, बल्कि लोकतंत्र और तानाशाही के बीच अंतिम दीवार बन चुकी है। जिस दिन यह दीवार गिर गई, उस दिन जनता की आवाज सत्ता के गलियारों तक कभी नहीं पहुंचेगी। इसलिए पत्रकार पर हमला केवल किसी व्यक्ति पर हमला नहीं होता, वह सीधे लोकतंत्र पर हमला होता है।
सबसे अधिक शर्मनाक स्थिति यह है कि देश में पत्रकारों के नाम पर बड़ी-बड़ी घोषणाएं होती हैं, प्रेस की स्वतंत्रता पर भाषण दिए जाते हैं, विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर सम्मान समारोह आयोजित होते हैं, लेकिन जमीनी पत्रकार की आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और कानूनी संरक्षण की बात आते ही सरकारों की संवेदनाएं दम तोड़ देती हैं। सत्ता बदलती रहती है, लेकिन पत्रकार की पीड़ा नहीं बदलती।
नीतिनिर्धारकों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल संसद की बहसों से नहीं चलता। लोकतंत्र तब जीवित रहता है, जब गांव के किसी कोने में बैठा पत्रकार भ्रष्ट प्रधान से सवाल पूछने का साहस करता है; जब जिला मुख्यालय का संवाददाता अधिकारी की लापरवाही उजागर करता है; जब कोई निर्भीक रिपोर्टर माफियाओं की आंखों में आंखें डालकर सच लिखता है।
आज आवश्यकता किसी औपचारिक सम्मान की नहीं, बल्कि ठोस नीति की है। पत्रकारों के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, न्यूनतम पारिश्रमिक, स्वास्थ्य एवं दुर्घटना बीमा, कानूनी सहायता, सामाजिक सुरक्षा और फील्ड में कार्यरत पत्रकारों के लिए विशेष संरक्षण तत्काल लागू होना चाहिए। यदि सरकारें वास्तव में लोकतंत्र की रक्षा करना चाहती हैं तो सबसे पहले लोकतंत्र के प्रहरी की रक्षा करें।
यह भी उतना ही आवश्यक है कि पत्रकारिता के नाम पर चल रही दलाली, ब्लैकमेलिंग और फर्जीवाड़े पर भी कठोर प्रहार हो। क्योंकि कुछ स्वार्थी तत्वों ने पत्रकारिता के पवित्र पेशे को बदनाम करने का काम किया है। ऐसे लोगों पर कठोर कार्रवाई हो, ताकि ईमानदार और संघर्षशील पत्रकारों का सम्मान और विश्वसनीयता अक्षुण्ण रहे।
सवाल यह नहीं कि पत्रकार को क्या मिला। सवाल यह है कि यदि पत्रकार सच लिखना छोड़ दे तो समाज को क्या बचेगा? कौन बताएगा कि अस्पताल में दवा नहीं है? कौन उजागर करेगा कि गरीब का राशन चोरी हो गया? कौन बताएगा कि सत्ता के गलियारों में भ्रष्टाचार पल रहा है? कौन जनता और शासन के बीच जवाबदेही की मशाल जलाए रखेगा?
लोकतंत्र के कर्णधारों को याद रखना चाहिए कि इतिहास सिंहासन की नहीं, सत्य की रक्षा करने वालों को याद रखता है। सत्ता का वैभव क्षणिक होता है, लेकिन पत्रकार की कलम युगों तक गवाही देती है। इसलिए यदि चौथे स्तंभ को आर्थिक रूप से कमजोर, सामाजिक रूप से असुरक्षित और राजनीतिक रूप से भयभीत करने का प्रयास जारी रहा, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान किसी सरकार को नहीं, बल्कि लोकतंत्र को होगा।
अब समय आ गया है कि देश की संसद, सरकारें और नीति बनाने वाले इस मूल प्रश्न का उत्तर दें—क्या पत्रकार का पसीना मुफ्त है? यदि नहीं, तो फिर ऐसी राष्ट्रीय नीति कब बनेगी जो लोकतंत्र के प्रहरी को सम्मान, सुरक्षा और उसके श्रम का न्यायपूर्ण प्रतिफल दे?
जब तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता, तब तक हर लोकतांत्रिक सरकार के माथे पर यह प्रश्नचिह्न अंकित रहेगा कि जिस चौथे स्तंभ पर पूरा लोकतंत्र खड़ा है, उसी की नींव को सबसे अधिक कमजोर क्यों रखा गया?
Author: Dainik kesariya Hindustan
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