शारदा ओसीएम में ठेका कंपनी ‘आर के’ पर गंभीर आरोप: भर्ती में मनमानी, ग्रामीणों का आमरण अनशन तेज

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अखण्ड प्रताप सिंह की रिपोर्ट
शहडोल/अनूपपुर क्षेत्र से विशेष रिपोर्ट
शारदा खुली खदान (ओपन कास्ट माइंस) इन दिनों एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। कोयला उत्पादन के लिए ठेका संभाल रही आर के अर्थ एंड रिसोर्सेस कंपनी पर ग्रामीणों ने गंभीर आरोप लगाए हैं—भर्ती में मनमानी, पैसे लेकर नौकरी देने, स्थानीय युवाओं की अनदेखी और वादाखिलाफी जैसे मुद्दों ने पूरे क्षेत्र में असंतोष की आग भड़का दी है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि बकही ग्राम के बुजुर्ग आदिवासी नेता ज्ञानचंद अपने साथियों के साथ आमरण अनशन पर बैठ गए हैं। तपती गर्मी में जारी यह आंदोलन अब प्रशासन और कंपनी दोनों के लिए चुनौती बनता जा रहा है।
विवादों में घिरी आर के कंपनी की कार्यप्रणाली
जब से शारदा ओसीएम में आर के अर्थ एंड रिसोर्सेस को कोयला खनन का ठेका मिला है, तब से विवाद लगातार सामने आ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कंपनी ने शुरुआत से ही पारदर्शिता नहीं बरती। रोजगार देने के नाम पर बड़े-बड़े वादे किए गए, लेकिन धरातल पर उनका पालन नहीं हुआ।
ग्रामीणों के अनुसार, कंपनी के संचालन से जुड़े प्रमुख लोग—पूर्व सर्वेयर अनिल सिंह, बैनर्जी और धर्मेंद्र—पर आरोप है कि उन्होंने भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह अपारदर्शी बना दिया। आरोप यह भी है कि योग्य स्थानीय युवाओं को नजरअंदाज कर बाहरी लोगों को प्राथमिकता दी गई और कई मामलों में पैसे लेकर नियुक्तियां की गईं।
इन आरोपों के चलते ग्रामीणों में गहरा आक्रोश है। यही कारण है कि कुछ समय पहले कंपनी से जुड़े कर्मचारी धर्मेंद्र के साथ मारपीट की घटना भी सामने आई थी। हालांकि इस घटना ने प्रशासन को सतर्क किया, लेकिन मूल समस्याओं का समाधान अब तक नहीं हो सका।
रोजगार के वादे बने अविश्वास का कारण
ग्रामीणों का कहना है कि जब कंपनी ने ठेका लिया था, तब स्थानीय लोगों को रोजगार देने का आश्वासन दिया गया था। बकही ग्राम के ज्ञानचंद और उनके साथियों ने उसी समय पहली बार हड़ताल कर अपनी मांगें रखी थीं। कंपनी ने उस समय भरोसा दिलाया कि स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता दी जाएगी।
लेकिन समय के साथ यह भरोसा टूटता गया। दूसरी बार हड़ताल के दौरान प्रशासन और कंपनी के बीच मौखिक समझौता हुआ, जिसमें 20 स्थानीय लोगों को नौकरी देने की बात कही गई थी। ग्रामीणों का आरोप है कि यह वादा भी “ताश के महल” की तरह ढह गया और किसी को स्थायी रोजगार नहीं मिला।
ज्ञानचंद का कहना है, “जब हमने पहली बार आंदोलन किया था, तब भर्ती शून्य थी। आज 168 लोगों की भर्ती हो चुकी है। सवाल यह है कि ये लोग कौन हैं और कहां से आए हैं?
स्थानीय युवाओं को क्यों दरकिनार किया गया
बीटीसी और पीएमई के बाद भी नहीं मिली नौकरी
मामले को और गंभीर बनाता है बीटीसी (Basic Training Course) और पीएमई (Pre-Medical Examination) का मुद्दा। ग्रामीणों का आरोप है कि कंपनी ने छह स्थानीय युवाओं का बीटीसी और पीएमई कराया, उन्हें प्रशिक्षण भी दिया गया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें नौकरी नहीं दी गई।
कोल इंडिया की सामान्य प्रक्रिया के अनुसार, बीटीसी और पीएमई तभी कराए जाते हैं जब व्यक्ति को रोजगार दिया जाना हो। इसके लिए उपक्षेत्रीय प्रबंधक कार्यालय से नाम भेजे जाते हैं और प्रशिक्षण के बाद नियुक्ति दी जाती है। लेकिन आर के कंपनी ने इस प्रक्रिया का पालन करते हुए भी अंतिम चरण में रोजगार देने से इनकार कर दिया।
ग्रामीणों के अनुसार, यह न केवल धोखा है बल्कि नियमों का खुला उल्लंघन भी है।
12 सूत्रीय मांगों के साथ अनिश्चितकालीन अनशन
इन सभी मुद्दों को लेकर ज्ञानचंद और उनके साथियों ने 12 सूत्रीय मांगों के साथ अनिश्चितकालीन आमरण अनशन शुरू कर दिया है। उनकी प्रमुख मांगें हैं—
स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता के आधार पर रोजगार दिया जाए
भर्ती प्रक्रिया की जांच कर पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए
बीटीसी और पीएमई पास युवाओं को तत्काल नियुक्ति दी जाए
प्रभावित गांवों के लोगों को रोजगार में आरक्षण दिया जाए
अनशनकारियों का कहना है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होंगी, आंदोलन जारी रहेगा।
उत्पादन पर असर, करोड़ों का नुकसान
इस आंदोलन का असर अब सीधे कोयला उत्पादन पर पड़ने लगा है। जानकारी के अनुसार, अनशनकारियों ने मिनसोल कंपनी के उत्पादन को भी प्रभावित किया है, जिससे पिछले दो दिनों में लगभग 40 लाख रुपये के नुकसान की आशंका जताई जा रही है।
मिनसोल कंपनी के अधिकारियों का कहना है कि उनका इस विवाद से कोई सीधा संबंध नहीं है। उन्होंने बताया, “यह अनशन आर के कंपनी के खिलाफ है, लेकिन हमारे उत्पादन को रोका जा रहा है। हमें कोई नोटिस नहीं दिया गया। यह पूरी तरह असंवैधानिक है।”
अब सवाल यह उठ रहा है कि इस नुकसान की भरपाई कौन करेगा—SECL, आर के कंपनी या आंदोलनकारी ग्रामीण?
प्रशासन की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
इस पूरे मामले में प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। बार-बार शिकायतों और आंदोलनों के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन केवल आश्वासन देता है, लेकिन जमीन पर कोई बदलाव नहीं होता। अगर समय रहते हस्तक्षेप किया जाता, तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती।
स्वास्थ्य बिगड़ने से बढ़ी चिंता
आमरण अनशन पर बैठे ज्ञानचंद की हालत लगातार बिगड़ रही है। हाल ही में हुए मेडिकल जांच में उनका ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ पाया गया है और ग्लूकोज लेवल भी काफी गिर गया है।
डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही अनशन समाप्त नहीं हुआ या उचित चिकित्सा नहीं मिली, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। संभावना जताई जा रही है कि उन्हें जल्द ही अस्पताल में भर्ती करना पड़ सकता है।

*क्षेत्र में बढ़ता तनाव, बड़ी घटना की आशंका*
शारदा ओसीएम में लगातार बढ़ते विवाद और तनाव ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता पैदा कर दी है। आए दिन काम रोको आंदोलन, गाली-गलौच और मारपीट की घटनाएं सामने आ रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया, तो यह विवाद किसी बड़ी घटना का रूप ले सकता है।

*समाधान की दरकार*
शारदा ओसीएम का यह विवाद केवल रोजगार का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह विश्वास, पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा हुआ है। एक ओर जहां ग्रामीण अपने हक के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कंपनी और प्रशासन के बीच तालमेल की कमी साफ नजर आ रही है।
अब जरूरत है कि प्रशासन तुरंत हस्तक्षेप कर निष्पक्ष जांच कराए और सभी पक्षों के साथ बैठकर समाधान निकाले। अन्यथा यह आंदोलन न केवल उत्पादन को प्रभावित करेगा, बल्कि सामाजिक असंतोष को भी गहरा करेगा।
फिलहाल सबकी नजरें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं—क्या समाधान निकलेगा या संघर्ष और गहराएगा?

Dainik kesariya Hindustan
Author: Dainik kesariya Hindustan

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