घटिया निर्माण की भेंट चढ़ रही नहर नाली, बनते ही पड़ने लगी दरारें; जल संसाधन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल

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(केसरिया हिंदुस्तान जिला ब्यूरो चीफ तोरन कुमार)

कवर्धा। पंडरिया विकासखंड के डोकरी घटिया (पुटपुटा) से पोलमी, भेड़ागढ़ और परसेंलखार की ओर जल संसाधन विभाग द्वारा कराया जा रहा नहर नाली निर्माण कार्य अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है। निर्माण शुरू हुए ज्यादा समय भी नहीं बीता कि कई हिस्सों में नहर की दीवारों और संरचना पर दरारें दिखाई देने लगी हैं। यह स्थिति न केवल निर्माण गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर रही है, बल्कि करोड़ों रुपये की सरकारी राशि के उपयोग पर भी गंभीर संदेह पैदा कर रही है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण कार्य में शुरू से ही भारी लापरवाही बरती जा रही है और विभागीय अधिकारियों की कथित मिलीभगत के कारण ठेकेदार मनमानी करने में लगा हुआ है।
ग्रामीणों के अनुसार नहर निर्माण में उपयोग की जा रही सामग्री मानक स्तर से काफी नीचे है। निर्माण स्थल पर नदी से निकाले गए मिट्टी मिश्रित काले रेत का उपयोग खुलेआम किया जा रहा है, जबकि तकनीकी रूप से ऐसी सामग्री मजबूत और टिकाऊ निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती। इसके बावजूद ठेकेदार द्वारा इसी घटिया सामग्री से निर्माण कराया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि शुरुआत में ही गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में यह पूरी नहर व्यवस्था किसानों के लिए परेशानी का कारण बन सकती है।
सबसे गंभीर आरोप सीमेंट और रेत के अनुपात को लेकर सामने आए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि निर्माण में सीमेंट की मात्रा जरूरत से कम रखी जा रही है, जिससे सीएनएस और कंक्रीट कार्य कमजोर पड़ता जा रहा है। यही वजह है कि निर्माणाधीन नहर में अभी से जगह-जगह महीन और स्पष्ट दरारें उभरने लगी हैं। सामान्यतः नया निर्माण मजबूत और ठोस दिखाई देता है, लेकिन यहां स्थिति उलट है—नहर बनते-बनते ही टूटन के संकेत देने लगी है। यह साफ दर्शाता है कि निर्माण गुणवत्ता में कहीं न कहीं गंभीर कमी है।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि निर्माण के दौरान पानी की तराई (क्योरिंग) का कार्य भी बेहद लापरवाही से किया जा रहा है। किसी भी सीमेंट आधारित संरचना की मजबूती के लिए नियमित और पर्याप्त पानी देना अत्यंत आवश्यक होता है। लेकिन यहां कई स्थानों पर निर्माण के बाद पर्याप्त तराई नहीं की गई। परिणामस्वरूप सीमेंट समय से पहले सूख रहा है और संरचना में सिकुड़न के कारण दरारें पड़ने लगी हैं। तकनीकी जानकार भी मानते हैं कि यदि क्योरिंग प्रक्रिया अधूरी रहे तो निर्माण की उम्र काफी घट जाती है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण स्थल पर तकनीकी अधिकारियों की उपस्थिति लगभग नाम मात्र की है। कभी-कभार औपचारिक निरीक्षण कर अधिकारी लौट जाते हैं और उसके बाद पूरा कार्य ठेकेदार के भरोसे छोड़ दिया जाता है। ऐसी स्थिति में गुणवत्ता नियंत्रण की उम्मीद करना ही बेमानी लगता है। लोगों का आरोप है कि यदि इंजीनियर और विभागीय अधिकारी नियमित निगरानी करते तो ठेकेदार इतनी खुली लापरवाही करने की हिम्मत नहीं करता।
इस पूरे मामले में निर्माण स्थल पर लगाए गए नागरिक सूचना पटल ने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सूचना पटल के अनुसार यह कार्य छत्तीसगढ़ शासन, जल संसाधन विभाग द्वारा कराया जा रहा है। पटल में स्पष्ट उल्लेख है कि यह कार्य कबीरधाम जिले के पंडरिया क्षेत्र के पुटपुटा व्यपवर्तन योजना अंतर्गत मुख्य नहर के आर.डी. 0 मीटर से 5850 मीटर तक रीमॉडलिंग, एस्केपमेंट, कंक्रीट लाइनिंग, गाद निकासी, गाइड वॉल निर्माण, वीयर मरम्मत तथा पाइप रिपेयरिंग से संबंधित है। इसमें ठेकेदार का नाम श्री सुरेश कुमार अग्रवाल दर्ज है। अनुबंध क्रमांक 04/DL/25-26, दिनांक 08/07/2025 अंकित है। अनुबंध राशि लगभग 4.73 लाख रुपये दर्शाई गई है तथा कार्य अवधि 10 माह बताई गई है।
यहीं सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है—जब सूचना पटल पर कार्य की स्पष्ट जानकारी, ठेकेदार का नाम और विभागीय जिम्मेदारी दर्ज है, तब निर्माण गुणवत्ता पर उठ रहे सवालों की जवाबदेही आखिर किसकी है? यदि कार्य विभागीय मानकों के अनुसार हो रहा है तो फिर निर्माणाधीन नहर में दरारें क्यों पड़ रही हैं? और यदि काम मानक से नीचे है तो संबंधित अधिकारी कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे।
ग्रामीणों में इस पूरे मामले को लेकर भारी नाराजगी है। उनका कहना है कि सरकार किसानों को बेहतर सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर भ्रष्ट कार्यप्रणाली और घटिया निर्माण के कारण योजनाएं दम तोड़ती नजर आ रही हैं। किसानों का स्पष्ट कहना है कि यदि नहर मजबूत नहीं बनी तो बरसात और पानी के दबाव में यह जगह-जगह टूट सकती है, जिससे सिंचाई व्यवस्था पूरी तरह प्रभावित होगी।
क्षेत्र के लोगों ने उच्चस्तरीय तकनीकी जांच की मांग की है। उनका कहना है कि निर्माण कार्य की स्वतंत्र जांच कराई जाए, उपयोग की गई सामग्री की लैब टेस्टिंग हो और जहां-जहां दरारें आई हैं, वहां तकनीकी मूल्यांकन कराया जाए। साथ ही दोषी पाए जाने पर ठेकेदार के साथ उन अधिकारियों पर भी कठोर कार्रवाई हो जो निगरानी की जिम्मेदारी निभाने में असफल रहे।
अब सबसे बड़ा सवाल जल संसाधन विभाग की कार्यशैली पर खड़ा हो गया है। क्या विभाग इन गंभीर आरोपों और सामने आती दरारों को केवल सामान्य तकनीकी समस्या बताकर नजरअंदाज करेगा, या फिर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर जनता के सामने सच लाएगा? फिलहाल हालात यही संकेत दे रहे हैं कि डोकरी घटिया (पुटपुटा) से पोलमी, भेड़ागढ़ और परसेंलखार तक बन रही यह नहर नाली, सिंचाई सुविधा देने से पहले ही घटिया निर्माण और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती दिखाई दे रही है।

Dainik kesariya Hindustan
Author: Dainik kesariya Hindustan

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